रिमझिम फुहार

आँखे नीर भरी ..

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मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा

Posted On: 13 Jan, 2016 कविता में

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मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा

मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा
ये बात पुरानी बेमानी सी
मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा
बात जो आज पुरानी सी

ये शहर मिरा इक शहर ही था
राहे इसकी अनजानी सी
तेरी तीर नज़र से घायल वो
जो लगती आज कहानी सी

वो दौर कुई जब आँखे अपनी
बाते करती लगती थी
रात गए छुप छुप कर
खवाब सुनहरे बुनती थी
जब बचपन अपना बीता चुका था
और धूप सुनहरी छाई थी
तेरी मीठी बाते कानो में
जब बजती थी शहनाई सी
तब अनजाने ही
मै ये गलती कर बैठा
मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा

वो नक्स तुम्हारा बदल रहा था
और मै हर पल राहे बदल रहा था
और बदल रही थी बाते अपनी
वक्त भी अपना बदल रहा था

तुम और बढ़ी और बढ़ कर छायी
जीवन अम्बर में बदली सी
रक्त तप्त धरा पे मेरी
तुम बरसी पहली बरसा सी
मलय गंध जो उड़ कर छायी
मधहोसी का आलम लेकर
मै उसका ज्ञापन ले बैठा
मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा

तुम पूछ रही थी मंजिल मेरी
मै अपना साहिल देख रहा था
तुम तिल तिल खुद को जोड़ रही था
मै खुद को घटता देख रहा था

मै दौड रहा था हांफ हांफ कर
तुम खुद को हर पल जीती थी
मंजिल अपनी इक मगर थी
राहें जुदा अब होती थी
तुम हमको इक देख रही थी
मै राह में तुमसे पिछड बैठा
मै तुमसे मोह्हबत कर बैठा

विनय सक्सेना



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