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तू पंख पसार

Posted On: 9 Oct, 2014 कविता में

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तू पंख पसार

तू पंख पसार
गगन निहार
कर मन विचार
तू हो तैयार
डर को तू तज ज़रा
तेरा ज्ञान है किधर धरा
तू सोच ले बस इक नज़र
फिर देख तू इक नयी डगर
तेरे कर कपार में भुजा हज़ार
तुझमे बसा है बल अपार
तू मन विहार
बस इक बार
तू हो तैयार
कर मन विचार
तू पंख पसार
तू गगन निहार
ये बात तुझमे नयी नहीं
ये ढूंडा तूने कभी नहीं
जीवन तूने जिया नहीं
तू मर मर के भी मरा नहीं
तू उठ और उठ के जरा सा चल
प्यास अपनी कर थोड़ी विकल
तू गिर जरा फिर उठ संभल
फिर मिलेंगे सब सारे हल
तू उठ और उठ के जरा सा चल
तू कर विचार विस्वास जरा
तू खुद को बस इक बार हरा
हार भी हारेगी तब
जब उठ के तू होगा खड़ा
बस
तू कर विचार विस्वास जरा
फिर सारे जग को तू हरा
ये मंजिल जैसी चीज़ नहीं
जिसको है तू देख रहा
चला स्वप्न का दौर जहाँ
और अंधियारे में तू पड़ा रहा

तू कर विचार
बस हो तैयार
खुद को जरा सा
बस सँवार
तू गगन निहार
बस पंख पसार
ये लौहपाश तूने खुद कसे
ये घाव तूने खुद चुने
ये स्वर्ण स्वप्न बिखर गए
ये हश्र उनके तूने चुने
तू हारा नहीं
ये अब जान ले
तू खुद है क्या
बस अब मान ले
तू निकल
बस हो विकल
बस जरा सा
खुद संभल
फिर देख तू
इक धरा नयी
इक सूर्य नया
और किरण नयी
इक नयी फिजा
दुनिया नयी इक कोई तैयार
बस खुद को तू जरा सांवर
तू हो तैयार
कर मन विचार
तू पंख पसार
गगन निहार
तू गगन निहार
तू गगन निहार….
तू गगन निहार……………
तू हो तैयार………………………..
तू हो तैयार…………………………………….
बस इक बार……………………………………………………..
तू हो तैयार …………………………………………………………………

विनय सक्सेना



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
October 10, 2014

बहुत ही प्रेरक पंक्तियाँ हैं …विनय जी साभार

विनय सक्सेना के द्वारा
October 10, 2014

सादर धन्यवाद ……आज की इस दुनिया में जब मै भी खुद को ज्यादा से ज्यादा पाने की दौड में हारता हुआ पाता हूँ और फिर जब खुद को खुद से ही हारा हुआ देखता हूँ और जब दुनिया मंगल गीत गाने में लगी होती है तब ये मेरा रुदन ही फिर से सहारा देने उठता है कलमबद्ध होकर….. फिर से सादर धन्यवाद……प्रोत्साहन के लिए


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