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गुलशन....

Posted On: 25 Mar, 2014 कविता में

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गुलशन

 

दरख्त तमाम मुन्तजिर है इस राहें गुलशन में

इक संग-राह भी नज़र है मगर इसी गुलशन में

 

खवाब रौशन रंगी खूब-गुल यहीं इस गुलशन में

हकीकत कांटो सी जवां मगर इसी गुलशन में

 

अंदाज-इ-बयां ऐसा कि इबादत हों जैसे

तंज ऐसे कि हरे ज़ख्म हों इसी गुलशन में

 

कुई था कभी सर-इ-शाम यहीं बैठा मेरे पहलूँ में

आज इक फूल सा महका मगर इसी गुलशन में

 

विनय सक्सेना



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 25, 2014

http://anandpravin.jagranjunction.com/2014/03/24/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A-%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A-2/ आपभी शामिल हों इस महामेला में………..सादर आपत्ति होने पर कृपया कमेन्ट डिलीट कर दें……

विनय सक्सेना के द्वारा
March 25, 2014

आनंद जी धन्यवाद …आमंत्रण के लिए…..

sanjay kumar garg के द्वारा
March 26, 2014

“आज इक फूल सा महका मगर इसी गुलशन में” सुन्दर प्रस्तुति, आभार!

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 27, 2014

बहुत खूब सक्सेना जी अच्छी रचना आभार मदन

विनय सक्सेना के द्वारा
March 27, 2014

Thanks Madan sir….

विनय सक्सेना के द्वारा
March 27, 2014

Thanks Sanjay ji….

abhishek shukla के द्वारा
March 29, 2014

बहुत खूब…आभार

Vinay Saxena के द्वारा
March 29, 2014

अभिषेक भाई …सादर धन्यवाद…


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