रिमझिम फुहार

आँखे नीर भरी ..

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मै हार गया.....

Posted On: 5 Mar, 2014 कविता में

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मै हार गया…..

 

मै हार गया  

दुनिया के इन तानो से

जीवन के इन बानो से

छल से जीती साँसों से

उर क्रिन्दन आवाजो से

 

“तड़प” तड़प के शोर बने

झूठ जहां घनघोर बने

जहां झूठी लीक हों जीवन रेखा

और सच कोई हों खेल अनोखा

 

मै हार गया

 

जहां जीती बातें बेमानी सी

अबूझ पहेली अनजानी सी

जहां दिल सारे सब बीमार हुए

सब के सब लाचार हुए

 

जहां खेतों में होली जलती थी

कल रज़िया वहां शहीद हुई

कलुआ के सीने पर गोली

जो गोली प्रेम मुरीद हुई

 

मै हार गया

 

जहां बाप के आंसू

माँ की ममता

दुनिया की बलिहारी हुई

जहां देश धरम की कच्ची रस्मे

झूठ की दुनियादारी हुई

 

यहाँ झूठ बिके बाजारों में

और हाथ दबे मीनारों में

सर रखे पैरों में उनके

और खड़े हुए कतारों में

मै हार गया

 

मै सारा सबकुछ हार गया

 

तुम मुंह पर ओढे झूठ की चादर

और जीवन सूरज डूब चला

कच्चा मै भी प्रेम प्याला

समय से मै भी टूट चला

 

धरम ये छूटा भरम ये टूटा

कोई सबकुछ मार गया

प्रेम हुआ सबको लेकिन

मै ही लेकिन हार गया

 

मै ही लेकिन हार गया

मै ही लेकिन हार गया

 

 

…… विनय सक्सेना



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
March 5, 2014

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय विनय जी : http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/03/05/नारी-तू-नारायणी-कविता/

विनय सक्सेना के द्वारा
March 5, 2014

Thanks Deepak Ji…..

sanjeevtrivedi के द्वारा
March 5, 2014

विनय जी सादर नमन है सुन्दर कविता है…नया समाज ऐसा ही है ……. झूठ और प्रपंच पर खड़ा है…. पता नही यहाँ कितने हार जाते है…

विनय सक्सेना के द्वारा
March 6, 2014

आदरणीय संजीव …… हम शायद झूठ/प्रपंच आधारित समाज से कम और उस समाज में अपनी सहभागिता के अपराधबोध से ज्यादा हारते है… विनय सक्सेना

aditya upadhyay के द्वारा
March 6, 2014

नहीं रुका जीवन अपना , अभी इस कर्मपथ पर , और चलना है .. बहुत मिलेगा आडम्बर तुमको , नहीं इनसे डरना है … कर शपथ इस ज़िन्दगी से , हमे चलते जाना है …हमे चलते जाना है … सर , बहुत सच्ची पंक्तियाँ रची है आपने , धन्यवाद ऐसी रचनाओं के लिए …..धन्यवाद

विनय सक्सेना के द्वारा
March 7, 2014

प्रिय आदित्य …..बड़ा भरोसा सा जगता है मन में जब आप जैसे साथियों में ये विश्वास देखता हूँ इन चाँद पंक्तियों में वर्णित मेरी स्वयं के खीज़ ही मेरे अंतर्मन को उर्जित करती है चिरंतन संघर्ष के लिए …….. अपने विषय में मेरे विषय को सम्म्लित करने के लिए धन्यवाद …….विनय सक्सेना

vinay saxena के द्वारा
March 7, 2014

….धन्यवाद योगी जी……


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