रिमझिम फुहार

आँखे नीर भरी ..

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परिवर्तन....

Posted On: 20 Jan, 2014 कविता में

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परिवर्तन

 

 

कतरा कतरा बदल रहा हूँ मै

तिरे सांचे में ढल रहा हूँ मै

 

जोर-इ-आजमाइश ऍ हवा थोड़ी और बढा ले

वक्त के साथ साथ थोडा संभल रहा हूँ मै

 

नज़र भी बदलेगी  नज़ारा भी बदलेगा

तिरी आँखों में एक सपने सा पल रहा हूँ मै

 

मिरी हिम्मत मिरा हौसला तो देख ऍ साहिब

सरे शाम से सहर की उम्मीद में जल रहा हूँ मै

 

मै कतल होने का डर नहीं रखता अब जेहन में

जानता हूँ डगर मकतल की है जो चल रहा हूँ मै

 

मै जो टूटू बिखरू तो रंज न करना इस आलम में

सूरत नयी बनानी है इसलिए पिघल रहा हूँ मै

 

 

डरता हूँ कि किसी दिन बिक न जाऊ बाज़ार में

बस बिक न जाऊ इसलिए बदल रहा हूँ मै

 

 

 

…कि कुछ बदले इसलिए बदल रहा है

…विनय सक्सेना



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 24, 2014

मै जो टूटू बिखरू तो रंज न करना इस आलम में सूरत नयी बनानी है इसलिए पिघल रहा हूँ मै डरता हूँ कि किसी दिन बिक न जाऊ बाज़ार में बस बिक न जाऊ इसलिए बदल रहा हूँ मै शुरू से आखिर तक बांधे रखती है आपकी रचना श्री विनय जी !

विनय सक्सेना के द्वारा
January 25, 2014

Thanks Yogi sahab…….


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